Thursday, June 28, 2018

हमें  भी डर लगता है
कभी पर्वतों की उचाई से, कभी समुद्र की गहराई से
डर लगता है
कभी अपनी ही परछाई से, कभी अपनों की जुदाई से
कभी गैरो की बनाई खाई से, कभी इन तन्हाई से......

डर लगता है
हमें उन पंछियो को देखने से
कहीं  उड़ते-उड़ते वो गिर ना जाए
अपनी मंजिल को ढूंढ़ने से
कहीं ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हम मिट ना जाए
डर लगता है इन बादलों से
कहीं बेमौसम ये बरस  ना जाए
डर लगता है अपनों की हरकतों से
कहीं किसी समय वो गैर ना हो जाए ...... 

घर जल्दी लौट आने का जब कहती है माँ
डर लगता है सोच के कभी वो कह ना पाए
हमारी ख्वाइशों की पोटली लिए जब  निकलते है  पापा
डर लगता है सोच के अगर वो लौट के ना आये
डर लगता है खुद पर भरोसा  करने से
कहीं हम टूट ना जाए
डर लगता है इंसानों के होने से
कहीं उनके होते हुए इंसानियत ख़त्म ना हो जाए.....

डर लगता है अपनी मुश्किलों का कागज पर उतरने से
डर लगता है खुदा से कुछ मांगने से
डर लगता है जिन्दगी के जंग में जाने से
दिल ये घबराता है  अपनों के ग़ैर हो जाने से.........

डर लगता है उन बच्चों की आँखों से
जो रह-रह के पूछती है अपने गुनाह को
डर लगता है उस भाई के आंसुओ से
जो फूट पड़ती है देख के बहिन की नंगी लाश को
डर लगता है देख के उस जवान को जंग में जाने से
जिसकी मौत दे देती है एक सांस उस मीडिया को
डर लगता है पूछने से ये सवाल
क्या कुबूल कर पाउंगी  कभी अपने हर गुनाह को........

इन शब्दों को मेरी कविता ना कहना
मेरे दर्द में छुपा हुआ ये मेरा डर है
और सुनो, डरती थी अंधेरो से,
मगर अब ये अपने आगोश में सुला देती है
डर तो है इन रौशनी की किरणों से
जो सब कुछ साफ़-साफ़ दिखा देती है. .........


                                                                       -ममता गुप्ता 

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